न सुर न ताल न साज़ चाहिए
मेरे लफ्ज़ों को तेरी आवाज़ चाहिए
चूम लेगी मन्ज़िल बढ़कर क़दम तेरे
उस राह में सिर्फ एक आग़ाज़ चाहिए
मिट सकती है खलिश बीते ज़माने की
होश ओ ख़िरद का बस वो अंदाज़ चाहिए
भूल कर बिसरे वक़्त को गले मिलो अब
नई सुब्ह का तराना बस आज चाहिए
वहां तक पहुंचने का जो किया है अज़्म
परिंदों जैसी ऐ खुदा इक परवाज़ चाहिए
मेरे लफ्ज़ों को तेरी आवाज़ चाहिए
चूम लेगी मन्ज़िल बढ़कर क़दम तेरे
उस राह में सिर्फ एक आग़ाज़ चाहिए
मिट सकती है खलिश बीते ज़माने की
होश ओ ख़िरद का बस वो अंदाज़ चाहिए
भूल कर बिसरे वक़्त को गले मिलो अब
नई सुब्ह का तराना बस आज चाहिए
वहां तक पहुंचने का जो किया है अज़्म
परिंदों जैसी ऐ खुदा इक परवाज़ चाहिए